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जसनाथ जी महाराज की जीवनी, नियम तथा ज्याणी समाज में मान्यता

जसनाथ जी महाराज की जीवनी, नियम तथा ज्याणी समाज में मान्यता
 

 कहानी राजस्थान के  महाराज जसनाथ जी की, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन लोगों की सेवा करने में न्योछावर कर दिया- 

अगर हम बात करें राजस्थान के समाज सुधारकों की तो जसनाथ जी महाराज का नाम हमें सबसे प्रथम पंक्ति में नजर आता है। जसनाथ जी एक ऐसे समाज सेवक थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज को सुधारने और समाज सेवा में समर्पित कर दिया था। महान समाज सेवक संत जसनाथ जी का जन्म विक्रम संवत 1539 की कार्तिक शुक्ला एकादशी (देवोत्थान एकादशी) को बीकानेर जिले के कतरियासर गांव में हुआ। इनका पूरा नाम श्री गुरु जसनाथ जी महाराज श्रेणी लोक संत था और ये जसनाथी संप्रदाय के प्रवर्तक थे। इनके पिता हमीर जी ज्याणी व माता मां रूपादे थी।

 क्या हैं कतरियासर गांव के लोगों की मान्यताए 

कतरियासर गांव के लोग मानते है कि कतरियासर गांव के जागीरदार हमीर जाट को एक रात स्वप्न में दिखाई दिया कि गांव की उत्तर दिशा में स्थित तालाब के किनारे एक बालक बैठा है। प्रातः तालाब के तट पर सचमुच एक सुन्दर बालक को देखकर निःसंतान हमीर जी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उसे घर लाकर उन्होंने अपनी पत्नी रूपादे को सौंप दिया। यहीं बालक संत जसनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
आपको बता दें कि नाथ सम्प्रदाय के लोग भगवान शिव के अनन्य भक्त होते हैं। समाज में फैली कुरीतियों और पाखंडों के खिलाफ नाथ समुदाय ने 36 नियम निर्धारित किए थे।
नाथ सम्प्रदाय में इन 36 नियमों का पालन करने वाले लोग जसनाथ कहलाने लगे।

 आओ जाने जसनाथ जी महाराज ने शिक्षा कहां से ग्रहण की 
जसनाथ जी महाराज ने अपनी संपूर्ण शिक्षा गोरख आश्रम से प्राप्त की।
गोरक्ष पीठ के गोरख आश्रम में जसनाथ जी की शिक्षा-दीक्षा हुई।
 गोरखनाथ महाराज को जसनाथ जी अपना गुरु मानते थे। जसनाथ जी महाराज का मानना था कि बिना गुरु के आपको कभी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।
जसनाथ जी महाराज ने ज्ञान प्राप्ति हेतु कठोर तप किया और अंत में विक्रम संवत् 1551 की आश्विनी शुक्ल सप्तमी को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।

 समय के साथ आगे चलकर जसनाथी अलग-अलग रूप में पहचाने जाने लगे 


आपको बता दें कि मुख्य रूप से जसनाथी गले में काले रंग का डोरा पहनते हैं।
जसनाथी सम्प्रदाय के वे अनुयायी जो सम्पूर्ण जीवन और संसार से विरक्त हो गए, वे परमहंस कहलाए।
जसनाथी सम्प्रदाय में भगवा वस्त्र पहनने वाले अनुयायी सिद्ध कहलाए।
श्री जसनाथ जी मात्र 24 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गये। इन्होंने आश्विन शुक्ल सप्तमी को समाधि ग्रहण की। जसनाथी संत जीवित समाधि लेते है।
ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे तथा गोरखमालिया नामक स्थान पर 12 वर्ष तक तपस्या की। जसनाथी संप्रदाय के प्रमुख लाल दास जी हैं।

 जसनाथ जी महाराज के उपदेश व जसनाथी संप्रदाय के नियम 
जसनाथ जी महाराज के उपदेश सिंभूदड़ा एवं कोड़ा ‘ ग्रन्थ में संग्रहित है। जसनाथी संप्रदाय के लोगों के लिए 36 नियमों का निर्धारण किया गया। इन 36 नियमों को मानने वाले लोग ही आगे चलकर जसनाथ कहलाए। 

 जसनाथी संप्रदाय के 36 नियम- 

 जसनाथ जी के 36 नियम 

1. जो कोई सिद्ध धर्म धरासी
2. उत्तम करणी राखो आछी
3. राह चलो, धर्म अपना रखो
4. भूख मरो पण जीव ना भखो
5. शील स्नान सांवरी सूरत
6. जोत पाठ परमेश्वर मूरत
7. होम जाप अग्नीश्वर पूजा
8. अन्य देव मत मानो दूजा
9. ऐंठे मुख पर फूंक ना दीजो
10. निकम्मी बात काल मत कीजो
11. मुख से राम नाम गुण लीजो
12. शिव शंकर को ध्यान धरीजो
13. कन्या दाम कदै नहीं लीजो
14. ब्याज बसेवो दूर करीजो
15. गुरु की आज्ञा विश्वंत बांटो
16. काया लगे नहीं अग्नि कांटो
17. हुक्को, तमाखू पीजे नाहीं
18. लसन अर भांग दूर हटाई
19. साटियो सौदा वर्जित ताई
20. बैल बढ़ावन पावे नाहीं
21. मृगां बन में रखत कराई
22. घेटा बकरा थाट सवाई
23. दया धर्म सदा ही मन भाई
24. घर आयां सत्कार सदा ही
25. भूरी जटा सिर पर रखीजे
26. गुरु मंत्र हृदय में धरीजे
27. देही भोम समाधि लीजे
28. दूध नीर नित्य छान रखीजे
29. निंद्या, कूड़, कपट नहीं कीजे
30. चोरी जारी पर हर ना दीजे
31. राजश्वला नारी दूर करीजे
32. हाथ उसी का जल नहीं लीजे
33. काला पानी पीजे नाहीं
34. नाम उसी का लीजे नाहीं
35. दस दिन सूतक पालो भाई
36. कुल की काट करीजे नाहीं

 जसनाथ जी के जन्म के समय चरम पर था जातिवाद और छुआछूत 

आपको बता दें कि जब जसनाथ जी का जन्म हुआ उस समय छुआछूत और जातिवाद अपने चरम पर था। लोग जातिवाद के माहौल में बैठे हुए थे छोटी जाति के लोगों से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा जाता था। ऐसे माहौल में महाराज जसनाथ जी ने इन कुरीतियों का डटकर विरोध किया।
जसनाथ जी एक अकेले ऐसे महाराज थे जिन्होंने भक्ति भावना व समाज सेवा के साथ साथ समाज में फैली रूढ़ियों और पाखंड का कड़ा विरोध किया। जसनाथ जी बचपन से ही समाज में फैले पाखंड के घोर विरोधी थे। जसनाथ जी महाराज निर्गुण और निराकार भक्ति में विश्वास रखते थे।

 संवत् 1563 में महाराज जसनाथ जी ने ली समाधि 
महाराज जसनाथ जी ने समाज में फैली कुरीतियों को खत्म करने लिए और भगवान के चरणों में ध्यान लगाने हेतु अपने भरे-पूरे परिवार को छोड़कर सन्यास ले लिया था, और सन्यासी बन गए थे। जसनाथ जी महाराज ने अपना संपूर्ण जीवन लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया था।श्री जसनाथ जी मात्र 24 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गए। इन्होंने आश्विन शुक्ल सप्तमी को समाधि ग्रहण की और भगवान के चरणों में लीन हो गए। जसनाथी संत जीवित समाधि लेते है।
ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे तथा गोरखमालिया नामक स्थान पर 12 वर्ष तक तपस्या की।

 महाराज जसनाथ जी को भगवान के रूप में पूजता है संपूर्ण ज्याणी समाज 

वर्तमान में संपूर्ण ज्याणी समाज महाराज जसनाथ जी को भगवान का दर्जा देते हुए उनमें अपनी आस्था रखते हैं, और अपना भगवान मानते हुए पूजा अर्चना करते हैं। आपको बता दें कि महाराज जसनाथ जी की समाधि कतरियासर (राजस्थान) में मौजूद है, और वहां पर लाखों की तादाद में संपूर्ण देश से लोग उनके दर्शन करने हर वर्ष जाते है। कुछ लोगों की यह भी मान्यता है कि कतरियासर जाकर महाराज जसनाथ जी की समाधि के दर्शन करने से लोगों के सब दुख-दर्द दूर हो जाते हैं।